Sunday, 22 May 2022

नदियों पर कविताएँ | Poem on Rivers in Hindi

प्रिय मित्रों, प्रकृति की सुंदरता से तो सभी अवगत है। ईश्वर ने ये प्रकृति इतनी सुंदर बनाई है कि इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। ये पहाड़, झरने, सागर और नदियाँ ये सब प्रकृति का ही रूप है। दोस्तों, ये प्रकृति हमें केवल अपनी सुंदरता से मोहती ही नही, बल्कि ये हमें नित नई प्रेरणा भी देती है। दोस्तों, आज हमारी कविता नदियों के बारे में है। नदियाँ पुरातन काल से पूजनीय रही है, क्योंकि सदा से इन्होंने जीवन दायनी का कार्य किया है। ये नदियाँ केवल नदियाँ ही नही हैं बल्कि ये हमें जीवन में आगे बढ़ने की कला भी सिखाती है। ये हमें सिखाती है कि कैसे रास्तों में बाधाओं के पार करके बहना और आगे बढ़ना है।

लेकिन ये बहुत दुःख का विषय है कि वर्तमान समय में लोगों ने नदियों की दुर्दशा बना रखी है। धीरे -धीरे ये अपना महत्त्व खो रही है। इसके लिए हमको प्रयास करना होगा। ये नदियाँ हमारी प्रकृति का हिस्सा है, हमें इनका संरक्षण करना होगा। हमें आशा है कि आप सबको यह Poem on Rivers in Hindi अवश्य पसंद आएगी और इनके जरिये आप कुछ सीख सकेंगे, ताकि हमको जीवन देने वाली नदियों का उद्धार हो सके।

नदियों पर कविताएँ | Poem on Rivers in Hindi


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Poem on Rivers in Hindi


नदी हूँ मैं

नदी हूँ मैं,
चली आई बहती निरंतर,
अविरल धुन में मगन,
छोड़ती पथ की बाधाओं को पीछे,
बढ़ती रही मैं धीर बनकर।

सहती रही नित पाषाणों को जिन्होंने,
घाव निरंतर दिए,
शूल से बने जो मेरे हृदय पर,
कूल उनको देती रही,
चलती रही निज कर्म पर,
मैं निज अश्रुओं को पी-पी कर।

कभी बादलों में ताप बनकर,
स्वयं में जलती रही,
नवजीवन अविनि को देने,
और करने उसका अलंकरण,
भूलकर विस्तार अपना,
बरसती रही बूँद-बूँद बनकर।

मैं नही बदली कभी,
मैं नदी थी निरंतर,
आधुनिकता की होड़ में,
जिंदगी की दौड़ में,
मानव के रंग समटने में मेरा,
बस रूप हो गया है कमतर ।

- निधि अग्रवाल

नदियों पर कविता


पर्वतों की आत्मजा

पर्वतों की आत्मजा मैं,
नाम मेरा निर्झरणी,
श्वेत तन और उर में चंचलता,
बहती रहती मैं अविरल सी।

कानन, उपवन की शोभा बनकर,
है जो ये विटप खड़े,
मिलती हूँ जब उनसे पथ पर,
ह्रदय में महकती मेरे उनसे, सुगंध स्नेह की।

झोंके पवन के,
मिलके मेरी लहरों से,
उमंग का भाव जगाते है,
मिलकर मैं भी उनसे, बन जाती उनसी।

ये नीला अम्बर भी निसदिन,
है मुझमें अपना, प्रतिबिम्ब खोजता,
मैं भी बनकर बादल, उसके प्रेम में,
हूँ फिर दिन-रात बरसती।

कभी सोचती हूँ स्वयं पर,
ठहरना और रुक जाना,
ये मेरा पुरुषार्थ नही,
हो जाना विलीन सागर में,
अंतिम मेरा मोक्ष यही।
- Nidhi Agarwal

Rivers Par Kavita


मैं हूँ नदी - सुनो मेरी कहानी !

मैं हूँ नदी,
सुनो मेरी कहानी,
दिखती थी कभी मैं अनुपम उज्ज्वल,
पर हो गयी ये अब बात पुरानी।

मैं हूँ नदी,
सुनो मेरी कहानी।

शुद्ध निर्मल सी बहती थी,
मैं धरती के आँचल में,
हो गयी मलिन इतने मानवकृत्यों से,
रंग-रूप से मुझको स्वयं ही होती हैरानी।

मैं हूँ नदी,
सुनो मेरी कहानी।

सबको जीवन देने वाली मैं,
आज मेरा अस्तिव अधर में है,
किससे कहूँ मैं व्यथा अपनी,
ये मानव भी हो गया अज्ञानी।

मैं हूँ नदी,
सुनो मेरी कहानी।

क्या होगा मेरा भविष्य,
विस्मय मुझको ये होता है,
हो रही हूँ संकुचित मैं धीरे-धीरे,
खत्म हो रही मेरी कहानी।

मैं हूँ नदी 
सुनो मेरी कहानी।
- Nidhi Agarwal

हमें आशा है कि आप सभी को यह Poem on Rivers in Hindi अवश्य पसंद आयी होगी। हम अपनी कविताओं के माध्यम से आपको नदियों के महत्त्व से आपको अवगत कराना चाहते है और उसकी विशेषता बताना चाहते है। ये नदी ही है जो हमें जीवन देती है, इनका अस्तित्व आज मानव जाति के कारण ख़तरे में है अगर हम जल्दी नही चेते तो इन नदियों के साथ-साथ हमारा भी भविष्य नष्ट हो जायेगा।

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