Friday, 31 July 2020

हिंदी दिवस पर कविताएँ | Poem on Hindi Diwas in Hindi

हमारे प्यारे देश भारत में कई भाषाएँ बोली जाती है जिसमें हिंदी एकमात्र भाषा है जो कि पूरे भारत में प्रचलित है। वैसे कहने को भारत देश भाषाओं का देश कहा जाता है और हिंदी यहाँ कि मुख्यता भाषा है। भारत में हिंदी भाषा को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। इसको 14 सितम्बर सं 1949 को संविधान सभा में राजभाषा का दर्जा दिया गया। उसके बाद से हिंदी के महत्व को बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है।

आज हम भी हिंदी जैसी अनमोल भाषा की प्रशंषा करते हुए और इसके संरक्षण हेतु, आपके समक्ष लेकर उपस्थित हुए है कुछ हिंदी दिवस पर कविताएँ, जिससे कि आप सब इसकी महत्त्वता को समझे और इसको ज्यादा से ज्यादा अधिमान दें।

हिंदी दिवस पर कविताएँ | Poem on Hindi Diwas in Hindi


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Poems on Hindi Diwas in Hindi

Poem on Hindi Diwas in Hindi


'हिंदी' हमारी मातृभाषा

हिन्दी है हमारी मातृभाषा,
और हमारे देश की पहचान।

इससे ही है गर्वित हमारी संस्कृति,
ये ही है हमारा अभिमान।

है हमारा कर्तव्य,
करना अपनी भाषा का मान।

रहे सदा जीवित ये जिससे,
और बना रहे इसका सम्मान।

आओ मिलकर ये वचन उठायें,
इसको हम न धूमिल होने देंगे।

रखेंगे हम सदा इसका ध्यान,
क्योंकि ये ही है हमारा स्वाभिमान।
- निधि अग्रवाल

हिंदी दिवस पर कविता


मैं हूँ सबकी पहचान

मेरी बोली मेरी भाषा,
जिसके अक्षर और शब्दों से मिलकर,
बनती है सुंदर हृदय की,
प्रेम की परिभाषा।

मन से मन को जोड़ती,
नए-नए रंगों में ढली मैं।
इंद्रधनुषी रंगों से अपने,
मृद सा रस घोलती।

संस्कृति से करवाती हूँ परिचय,
देती सभ्यता का ज्ञान।
मुझसे ही जुड़ा इतिहास सबका,
मैं हूँ सबकी पहचान।

न जाने कितनी गाथाएँ,
और कितनी शौर्य की कहानी गायी है।
और सुनहरे पन्नों में लिखी थी,
मैंने मेरी ही जुबानी।

हिंदी हूँ मैं,
चली आयी पुरातन से,
रहूँगी यूँ ही बहती तुम्हारी रगों में कल-कल,
जैसे हिमालय से निकला पावन गंगा का जल।
- Nidhi Agarwal

Hindi Par Kavita


मैं हिंदी हूँ

खो रही हूँ स्वयं का अस्तिव मैं,
हो गयी हूँ अपभ्रंश,
टूट से गये है मेरे स्वरों के तार,
कर रहे मेरा विध्वंस।

कौन हूँ मैं स्वयं से जब पूछती,
आती है एक मध्यम सी ध्वनि,
मैं हिंदी हूँ।

थी कभी मैं भी विशिष्ट,
और सबसे अद्वितीय,
पर हुए इतने आघात मुझपर,
कि हो गयी हूँ मैं किलिष्ट।

खोज रही स्वयं में ही स्वयं को,
मैं हिंदी हूँ।

न करो यूँ अपमानित मुझको,
और मेरे स्वरूप का विनाश,
करो कुछ ऐसा कि,
बढ़े मेरी पहचान और हो मेरा विकास।

 चीख़-चीख़ कर सबसे यही पुकार,
मैं हिंदी हूँ।
- Nidhi Agarwal

अगर हम एक नज़रिये से देखें तो हिंदी भाषा हमारी अतुल्य संस्कृति की नींव है। यह हमारी विरासत है। जिसको हम सबको सहेज के रखना है और यह हम सबका पहला कर्तव्य भी है। हमें आशा है कि आप सबको यह Poem on Hindi Diwas in Hindi अवश्य पसंद आयी होंगी, यदि अच्छी लगी हो तो इन्हें अपने मित्रों के साथ साझा अवश्य कर दें, पेज पर उपस्थित सोशल मीडिया बटन्स के माध्यम से, ताकि वह भी हमारी राष्ट्रभाषा को सर्वोपरि करने में योगदान दें सकें।

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