Monday, 4 January 2021

सर्दी पर कविताएँ | Poem on Winter Season in Hindi

दोस्तों, प्रकृति ने कई सारे मौसम उपहार के रूप में हमें भेंट दिए है। हर एक मौसम के अपने-अपने मज़े होते है। हर मौसम में हमें प्रकृति के नए-नए रंग देखने को भी मिलते है। कुछ लोगों को बारिश का मौसम पसंद होता है, कुछ लोगों को गर्मी का और हममें से ऐसे बहुत से लोग हैं जिनको ठंडी अर्थात जाड़े का मौसम बहुत प्रिय होता है। जाड़े का मौसम आता है तो साग-सब्जियों और खाने-पीने वाली चीजों की भी बहार लग जाती है। लोग इन सारी चीजों का जाड़े के मौसम में काफी आनंद उठाते है और मिलकर मौज-मस्ती करते है। जाड़े में एक तरफ रजाई और कंबल का आनंद तो दूसरी तरफ शरीर को कंपा देने वाली ठंडी का भी अहसास होता है। जाड़े के मौसम के इन्हीं आनंदों का वर्णन करते हुए आज हम आपके समक्ष साझा करते है कुछ Poem on Winter Season in Hindi, ताकि आप सब हमारी कविताओं के माध्यम से सर्दी के मौसम का और आनंद ले सकें।

सर्दी पर कविताएँ | Poem on Winter Season in Hindi


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Poem on Winter Season in Hindi


जब-जब ठंडी आती है

जब-जब ठंडी आती है,
हमको बड़ा सताती है,

राते बड़ी बड़ी देकर,
दिन छोटे कर जाती है।

सारा दिन बस रजाई में,
आलस की अंगडाई में,

जाने कब फुर हो जाता है,
तपते की कढाई में।

सूरज चाचा जी भी,
हमको बहुत सताते है,

बादल में छिप जाते है,
धूप नही खिलाते हैं।

कब ये ठंडी जाएगी,
रजाई कम्बल टोपी,

और स्वेटर का बोझ,
हमसे दूर भगाएगी।
- निधि अग्रवाल

सर्दी पर कविताएँ


आई देखो ठंडी आई

मौसम ने ली है अंगड़ाई,
आई देखो ठंडी है आई,

बंद हो गए पंखे सारे,
निकल गयी सबकी रजाई।

आई देखो ठंडी है आई,

पानी को छूने से लगने लगा है डर,
ठंडी हवा से तन-मन हो जाता है सिहर,

बिन सूरज दादा के तो,
आने लगती है कपकपाई।

आई देखो ठंडी है आई,

इस मौसम में तो बस अच्छी लगती है,
कॉफ़ी की चुस्की और चाय की गरमाई,

साथ अगर पकौड़ों का हो तो,
हो जाता है अपना सुखदाई।

आई देखो ठंडी है आई,

कोई काम करने को जो कह देता,
लगता है खुद की शामत हो जैसे आई,

हो जाते हाथ बर्फ से कंडा जब,
याद आती फिर जल्दी से अपनी रजाई।

आई देखो ठंडी है आई।
- Nidhi Agarwal

Winter Season Par Kavita


ठंडी तुम मन को भाती हो

ठंडी तुम मन को भाती हो,
गर्म रजाई और कंबल का आराम,
तुम ही तो संग अपने लाती हो,
ठंडी तुम मन को भाती हो।

मक्के की रोटी के साथ,
बनता है जब सरसों का साग,
तुम ही तो उसका स्वाद बढ़ाती हो,
ठंडी तुम मन को भाती हो।

चाय और कॉफी की चुस्की से,
पकौड़ों और कचौड़ियों संग चटनी से,
सबके खाने का आनंद बढ़ाती हो,
ठंडी तुम मन को भाती हो।

तपते की गर्माहट से,
सूरज दादा की आहट से,
जब तुम मुझे मिलाती हो,
ठंडी तब भी तुम मन को भाती हो।
-निधि अग्रवाल

हमें आशा है कि आप सबको यह सर्दी पर कविताएँ अवश्य पसंद आयी होंगी, यदि अच्छी लगी हो तो इन्हें अपने प्रियजनों संग साझा अवश्य करदें ताकि वो भी हमारी कविताओं के संग सर्दी के मौसम का लुफ़्त उठा सकें।

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